Sunday, December 4, 2016

बिखरा केवल मैं ही नहीं

बिखरा केवल मैं ही नहीं 
आदत में अक्सर हर चीज 
बिखरी लगती है, शब्द, 
चाय के गिलास, कपड़े , 
और स्मृतियाँ।

कितना कुछ है अतिरिक्त जो 
बीता नहीं. 

Aug. 17, 2016

Why cure words?

The muse is afar 
A single soliloquy is 
all I can muster 
I have forgotten the 
words of loneliness 
the syllables of despair

The drifting moon 
cracks open the secrets 
of longing but the text is 

Why do you call forth 
in unfathomable gestures? 
Can't the rain be simple? 
Can't the dusk just slip
into the script of the night
unwritten? Can't love be 
longed for silences? 

Why cure words? Why 
run through language 
holding our hands like 

Aug. 19, 2016

Tuesday, July 19, 2016

Notes to the confused self

Be eager, in the monotony
of the day lies a crack that 
only some fathom, others 
rarely see, and some 
pass it by. Take time not 
to injure your solitude with 
the reckless pursuit of 
meaning. Not all that 
passes is worth the distraction, 
not all that arrives is 
worth attention. But look 
you must, reason dawns 
slow, understanding is 
an accumulated bag we 
never see. Sit alone 
and pursue the breaks 
in time, ponder over 
memories and their 
fragile corners, dust your 
inner shelf, let some 
stick in your hands for 
a lingering aftertaste. 
Sometimes drag 
yourself out to the 
cobbled streets and the 
chaos, let the wilderness 
of the city drown you. Attend
to the idle chatter between 
the pauses, listen. You have
arrived at a contradiction, 
begin again. Rewind your 
routes and feel the changing
acceptances of the earth. 
Perceive the openings in 
the doors of perception, 
urge your curiosity to go 

Sunday, July 17, 2016

Evening musings

 Slouched in the easiness of my bean bag I listen to music from far, the rumours of memories faint for a while. The light has gone dimmer, an easy dusk slips through the window and settles on the tip of the coffee table. I switch on the yellow light to enervate the temptation of the evening. A rustling wind comes and plays with the edge of the folded bed, a tiny piece of the night winks at the pillows. The books laid bare still the void in time. I wonder at the 'chronology of water', at the chronic pauses that lovers leave in their conversation. Will you again come and paint the words for me? You were good with colours, now the house looks bare, the posters lying astray waiting for caring hands, the empty walls wait in expectation, they give me the quizzical look of the woman wanting to speak at a bus stop to kill time, to share the burden of waiting. But I hear only faint rumblings in a foreign tongue, I listen deep to decipher the words, but understanding has gone missing. I accept my failure, affirm my ephemerality, and bind myself to the waiting for things to dawn on me. How long? 


We wondered whether we could push 
through the dusky silence of the mountains,
an old song stabs at the corners of the evening.

In the folds of the hills we read our fault lines. 

Desires, like distant echoes, ebbed and flowed
like a dead melody over the vast expanse 
of emptiness

Its time that returns are planned, some bags are packed, 
some silences affirmed.
Its time for the awe of wonder to dig deep within.

Its time that the eyes see, accept the 
changing proclamations of time

Sunday, July 3, 2016

The disappearance of words

And suddenly it meant nothing, he had seen the dust settle on the letters. This was a disappearance he had always feared, not the disappearance of the lost or of the longing, but the disappearance of the things near, things that stop speaking, things that turn dust long before their expiry date. He did not know that words expired too, that they died when touched with brittle hands, for they are long ensconced in our desires and memories, that they stop teasing us the moment we are far from our longing. He wanted to scribble it all on the letters, make a note of their dates, and the time when they arrived, and his feelings with them. But he was tired of a waiting that never ends, it was his tirade against time and hope that had crippled him and made him their slave. 

Thursday, May 26, 2016

Old skin, lost words

Old skin, you have feasted 
on silence for long. The words
you don't have are your scars. 
When will you be whole again? 
When will your creases fill? 
For long you have listened
and forgotten your voice. In 
the nights of agony only a 
whimper escapes your tongue
and long before it falls into 
discerning ears it dies in the 
chaos of understanding. There
is always a story you never
live to tell. But its your version
that goes missing. 

Sunday, May 1, 2016

सपने का आदमी

आज कुछ अटका हुआ है दिन
छन कर आया हो जैसे किसी
उदासी से, आज तो कहीं नहीं
गया मैं, न किसी से बात ही की।
माज़ी तो नहीं जो दबे पाँव सांझ
की करवट ओढ़े मेरी खिड़की
पर अटका पड़ा है?

अब मुझे पूछ ही लेना चाहिए
उससे जो गए बरस छोड़ गयी
क्या वो जाते-जाते अपने सपनों में
आया वह आदमी भी ले गयी
जिसे कभी अकेलेपन में उसने
गढ़ा था?

मैं वो इंसान तो कभी नहीं
बन पाया, पर एक टीस
सी रह गयी न  बन पाने

आज मैं कुछ और हूँ,
पर हूँ उसी सपने का आदमी।  

Friday, April 22, 2016

बचा हुआ सा कुछ

शब्द सीखा तुमसे ही 
मैंने, एक यकीन था 
उनके जादू पर।  
कैसे घर कर जाते 
थे शब्द जब कभी 
ख़ामोशी का दायरा 
बढ़ जाता। कभी 
हाथों के गीलेपन 
से उसे हम चुरा 
लेते, कभी धूप के 
नन्हे से टुकड़े से 
उधार मांग लेते और 
आदतन चाय की 
चुस्कियों में ज़ाया 
कर देते।  जो बचा 
रह जाता उसे कपड़ों 
में तह कर भूल 

बुरे दिनों की 
लत लगी नहीं थी 
उन दिनों तभी तो 
याद का किनारा 
कमजोर था, बह 
निकलता था नज़रें 
चुरा कर।  न जाने 
कितनी गलियों से 
गुज़रा हो, न जाने 
कितने घर डुबोएं  
हो।  कश्ती भी कागज़ 
की थी और बचने  की 
मोहलत किसे थी।  बस 
तैरना था उन दिनों 
तुम्हारी आँखों में।  

अब तुम नहीं हो 
तो जैसे कुछ टूट 
गया है।  एक बाढ़ 
आती है रोज़ , समय 
नहीं बताती, नहीं रुख।  
पर आती है रोज़ 
जब मैं नज़रें बचा 
यादों को सुखा रहा 
होता हूँ, जब पागलपन 
में कपड़ों को टांग 
कुछ शब्दों के पिघलने 
का इंतज़ार कर रहा 
होता हूँ। 

बाढ़ आती है, 
सब कुछ बिखर 
जाता है।  बचता है 
सन्नाटा और एक 
शब्द, खालीपन। 

Thursday, April 21, 2016

चले आओ, मत आओ

अब कहाँ उस मौसिकी के मौज़
पर तुम्हारी करवट और कहाँ
उन दिनों के गीत? कहाँ फुर्सत
के बोल साहिलों के रेत पर सिमटे
हुए? बस एक ये बूँद है और वो तुम्हारी
कभी न फूटती हुई हंसी. दोनों एक ही हैं
बस चिलमन के उस पार लिपटे साखों
से मेरे घर को भिगाती हुई, चले आओ
के ये बोल अब मेरे होठों को नहीं छूते,
अभी मत आओ मैं उन हर्फों को भूल
चूका हूँ।

Tuesday, April 19, 2016

जीवन एक यात्रा

मुझे आजकल ये एहसास होने लगा है, की अगर जीवन एक यात्रा है तो मै एक ऐसे ट्रेन में सफ़र कर रहा हूँ जो कब की छूट चुकी है। मैंने बड़ी कोशिस की थी उसे दौड़ कर पकड़ने की, यात्रा से कई दिनों पहले स्टेशन भी पहुँच गया था, मगर फिर भी ट्रेन छूट ही गयी और मै उस पर सफ़र करता चला गया। अभी भी करता ही जा रहा हूँ, स्टेशन कितने आये गए जो अपने नहीं लगे, जिन्हें कभी भी मैंने जाना नहीं था, कई बार उतरा उन पर। रात बिता दी, देखता रहा चाँद की रौशनी कैसे अपनी परछाई छोड़ जाती है इन सुने स्टेशन पर। अनगिनत गिलास चाय के पिए, वो चाय की ही प्यास तो थी जो उतार लाइ थी मुझे इस उजड़े सुनसान से स्टेशन पर। मै फिर बैठ गया इंतज़ार करने उस अगली गाडी का जिसे छूट ही जाना है, मगर ये गाड़ियाँ जाती कहाँ है, उन पर न नंबर होता है, न ठीकाना, फिर ये आखिर जाती कहाँ है। और ये लोग जो इसमें बैठे हैं, ये इतने खुश नज़र आते हैं , क्या इन्हें पता है वो किधर जा रहे हैं? क्या भटका हुआ केवल एक मैं ही हूँ? जब पुल पर गाडी सरसराती हुई निकल जाती है, एक गड-गड की आवाज़ जब पटरियों से होते हुए जब सामने वाले बर्थ से सिमटते हुए इस अँधेरे वातावरण की शान्ति को भिगो जाती है, अब कहीं उसकी प्रतिध्वनि लौट कर आती है मेरी कानों में। बगल की सीट पर बैठी हुई एक लड़की अंगड़ाई लेकर फिर से सो जाती है, उसे भी शायद पता है वह कहाँ जा रही है। इस प्रतिध्वनि से मै जाग जाता हूँ; जीवन का शायद एक और पुल पार हो गया जिसे मैंने कभी बनाया नहीं था। कौन बना जाता है ये पुल जिन पर हमें चलना ही होता है? जैसे ये रास्ते अपने आप ही चलते जाते हैं और हमें एक छूटने वाली गाडी में छोड़ जाते हैं? मैंने तो अपने पीछे के सभी पुल जला डाले थे, फिर भी इन खड खडाती हुई पटरियों में मुझे अपना ही राग सुनाई  दे जाता है, जैसे कोई है, आता है रोज़, घंटो बैठ जाता हो मेरे किनारे, मगर अपने होने का प्रतीक नहीं छोड़ता। मै रोज़ उन कागज़ के टुकड़े जो वो बिखेर जाता है उसे इक्कठा करता, नित समेट कर उन्हें रख देता, पानी का बर्तन छोड़ देता गर्म होने के लिए फिर बैठ कर उसका इंतज़ार करता रहता। वह रोज़ नहीं आती, चाय की गिलास वैसे ही भरी रह जाती, वैसे ही रोज़ टिकेट चेकर आकर टिकेट देख जाता और मुस्कुराकर कहता , आपको पहले भी कहीं देखा है? शायद आप हमेशा सफ़र पर ही रहते हैं? आप काम क्या करते हैं? जी, मैं? मैं हमेशा उसी ट्रेन में होता हूँ जो मुझसे छूट गयी हो। फिर ये किताबें? ये किताबें मेरी नहीं हैं, ये किसी की अमानत है वो छोड़ गयी थी कभी सफ़र में, कहा था फिर आकर कभी ले जायेगी। भैया ये गाडी इस स्टेशन पर नहीं रूकती? सर आप कौन सी गाडी में बैठ गए? वो इस गाडी से पहले ही कहीं दूर चली गयी ? फिर ये पुल कौन सा था , इतना विस्तार जैसे अपने भीतर कितनी सदियों का भार उठाये हुए? ये नदी कौन सी थी जो निरंतर बहे चली जा रही है अपने विस्मृति में? मै भी शायद कभी आया था उसके घाट  पर एक नाव बना कर बहा देने के लिए, उसमे एक ख़त और कितने ही सपने थे। पता नहीं उस नाव का क्या हुआ? कागज़ की नाव पर सपने चलते हैं बाबू? उस पर नाम धुला नहीं होगा, है न? किसी ने तो उसे पाकर अपने पास सहेज कर रख लिया होगा? या फिर निकल पड़ा होगा उस लड़की की खोज में जिसके नाम यह ख़त लिखा था मैंने? या फिर क्या उसने उसी तरह उसे छोड़ दिया होगा पिघलने के लिए? या फिर अभी भी वह बहे चले जा रही है, क्यूँ की उसे कोई उठाने वाला नहीं मिला? 

February 6, 2013. 

Wednesday, April 13, 2016

There is always a place for waiting

There is always a place for the waiting, patience might run its course and like a tired walk wait for its pause and sit under a shadowless tree unsheating itself bit by bit. But wait like a tireless crusader runs and sits awkward in silent moments when habit has been shed for the day. It never overplays monotony, remains its silent company turning into words unknown; a language crafted against it. Sometimes it sheds hope as a load that it can no longer carry and walks along the frail steps of an old woman whose freckles and the crumbling skin tells a story you will never hear. It parts company with the city sounds as they coalesce around the cup of tea you yearn for on nights of insomnia. It curates your diary as words fall off from their practiced writing. It tickles memory when the door is left ajar and the wind knocks on the window. You hear the purr of a cat and discard another day in your calendar feeling the breathlessness that borders on nausea. Images tumble around that you cannot capture in your faithful camera.

March 20, 2016.
8:15 pm

Monday, April 11, 2016

कोई आया था क्या?

कोई आया था क्या? नहीं? सफ़ेद सांझ में अपनी धमनियों का चलना सुन रहे हो तुम. क्या यह सही है? या फिर सब कुछ यही है? पता नहीं। पता होने के बावजूद भी कोई धमनियों का चलना कैसे रोक सकता है? एक अजीब विस्मय है, और उससे भी अजीब एक खोज।  रोज़ चलता हूँ, रोज़ नहीं मिलती।  फिर भी चलने की आदत का मैं क्या करूँ? सोचने की आदत का, याद की आदत का मैं क्या करूँ? शायद कुछ नहीं।  या फिर बहुत कुछ।  पर निर्णय की घडी अभी नहीं आई, या आई थी क्या और चली गयी ? मुझे तो बस इंतज़ार करना कहा गया था , बस इंतज़ार।  पर तुम इतने जड़ कबसे थे? तुमने तो सुना था रात को आते हुए, तुमने उसे सिमटते हुए भी देखा था, तुमने रात के अँधेरे कमरों में गुम हुए लोगों को भी महसूस किआ था, तुम देर तक कुकर की सीटियों को फ़ैल कर दीवारों पर चिपकते हुए भी देखा था, तुम वहां - वहां भी गए थे जहाँ पके खाने की सुगंध फ़ैल जाती है, तुमने चाय की प्याली में बैठे हुए पत्तियों को भी देखा था, तुम देर रात भटके हुए पंछियों के साथ भी भटके थे. तुमने सन्नाटे की दीवारों को घर करते भी देखा था, तुम वहीँ थे जब खालीपन अपनी जगह से थोड़ा सरक गया था।  उसने अपना नाम नहीं बताया था , पर तुमने कई बार दीवारों को पोछ कर कुछ मिटाना चाहा था, तुम अपने बिस्तर को बदल कर नयी चादर भी डाली थी, तुमने उस कप को भी तोड़ दिया था, और कई बार उस खाने की महक को भी भूलने की कोशिश की थी जो उस रोज़ तुम्हे आई थी. फिर भी कुछ बचा था जिसे तुम ढूंढ रहे थे।  क्या? 

Sunday, April 3, 2016

रात वैसे ही सरक रही है

कुछ टप-टप सुनाई दी फिर घुल गयी शोर में. मुझे लगा जैसे कोई आहिस्ता से आया मेरे एकांत में और हलके आहट से समा गया हो मौन में. धीरे जैसे कोई दरवाज़ा खुला, एक आधा निमंत्रण देकर छोड़ गया हो. जैसे कोई कह रहा हो अगर इस एकांत में भी तुम मुझे सुन पाये, अगर अभी भी कोई खाली जगह है जिसे तुम भर नहीं पाये तो चले आओ इस ओर. मैं देर तक सुनता रहा. खिड़की से एक सुनहरी हवा ने किवाड़ को आधा खोल दिआ था, और छन -छन कर कुछ टपक रहा था. मैंने सोचा रात है और बेमौसम की कोई बारिश। शायद वह भी खोई हुई है. पता नहीं की बरस जाना है या फिर गुज़र जाना। मैं आवाज़ के पीछे पीछे हो लिआ और पहुँच गया अपनी बालकनी पर. देखा आधी सड़क भीगी पड़ी है और रात वैसे ही सरक रही है जैसे मैंने उसे कल छोड़ा था. 

Love is not room of rumour

play on.
Trip on the shadow.

sieve the fragments.
Be residue.

arrange the empty spaces.

mark the endless distances.

Longing is another knowing.

Anticipate not, be.
Let your pauses unfold.

Love is not a room of
rumours, a crack in the
dust, it peels not
like rust. You cannot
wipe yourself clean.

Its the recurring wave that
fills and empties you
at the same time. It leaves
a mark on the stone.

The script takes long deciphering.

Saturday, January 2, 2016

...some infinities do meet

I fail everyday,
a failure that marks
my obsolescence.
How many infinities
must pass before 
I am born again?
I travel between parallel
lines marking various 
points of meeting
challenging the certainty 
that only infinity makes 
parallel meet

I dress my finitude in 
uncertain colors, perhaps 
life will skip me 
by, but every effort 
completes the circle 
where desires die

Some infinities do meet,
but a life time passes or 
perhaps a second before 
we realise the difference 
in breadth, realign 
the lines and rehearse
another day